राजनेता अपनी राजनीति से भोली और भावुक जनता को कैसे ठगते हैं ?
1. वे अपनी इज्जत को आपकी जाति या सम्प्रदाय की इज्जत से जोड़कर आपका मानिसक शोषण कर लेते हैं. जबकि उनकी और उनके परिवार की इज्जत अलग दर्जे की है...किसी सरकारी दफ्तर में उसकी और आपकी इज्जत अलग ढंग से होती है. उनकी आर्थिक स्थिति से उपजी इज्जत भी आमजन से अलग होती है.
2. वे आपका नुकसान करके भी आपको अहसास दिला देते हैं कि इसमें आपका फायदा है. वे कहते हैं, आपके परिवार की स्थिति खराब हुई होगी पर आपने जाति, सम्प्रदाय और देश के लिए बड़ा त्याग किया है. आप मान भी लेते हो !
3. वे जागरूकता के सख्त खिलाफ हैं. आपके जीवन के असल मुद्दों से उनको परहेज है. वे कहते हैं, इसमें समय खराब मत करो, हम फोन करके आपकी समस्या सुलझा देंगे. उनके आज तक के फ़ोनों से जनता की सभी समस्याएँ लगभग ख़त्म हो चुकी हैं !
4. वे अपने आपको राजा, रानी या राजकुमार की तरह पेश करते हैं...फ़िल्मी हीरो की तरह ....ढोंग तमाशा करते हैं, झूठे झांसे देते हैं...और आपके भीतर के गुलाम को, डरपोक व्यक्ति को जगा देते हैं. फिर आप उसके पीछे भीड़ बनकर बिना सोचे समझे चल देते हो ! महान कार्य करने को ! अपने आपको बर्बाद करने को.
5. वे समाज को अपने एंगल से बांटने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं....अंग्रेजों का नियम...divide and rule...उन्होंने अपना लिया है. आपको बांटकर वे कभी भी एक हो लेते हैं और कहते हैं....मतभेद हैं, मनभेद नहीं ! साथ में पार्टियाँ करते हैं.....एक दूसरे जो जन्मदिन मुबारक कहते हैं....इधर आप जहर की उल्टियां करके माथा खराब करते रहते हो.
बात सही है क्या ? तो क्या किया जाए ? अपनी समझ से, इन राजनेताओं को लोकनेता बनाया जाए....उनका दोष नहीं है, वे हैं तो अपने ही...दोष अपना है....हम जैसे होते हैं, वैसे नेता बना लेते हैं, चुन लेते हैं......