वीर तेजाजी पत्नी पेमल को लाने के लिए ससुराल जाते हैं,

 वीर तेजाजी पत्नी पेमल को लाने के लिए ससुराल जाते हैं, ससुराल पनेर के पास पहुंचने से पहले नदी में पानी का वेग बहुत तेज था। नदी को पार करना बड़ा मुश्किल हो रहा था। तब लीलन घोड़ी ने क्या कहा देखें कवि करूण की कल्पना के अनुसार

बैठ तो सही पीठ पर ठीक 

थाम तो कसकर आज लगाम 

इस समय दूंगी दुलकी त्याग 

लगाने दे निर्बंध छलांग 


हिना-हिना पड़ी लगाकर जोर 

चंडिका सी दिखी विकराल 

सिंहनी सी लीलण की पीठ 

उछलकर जा बैठा तत्काल 


साथियों सहित बिना अवसेर 

तलहटी की दिशि किया प्रयाण 

वहां कुछ कम गहरी थी नदी 

और कुछ ऊंचा रहा स्थान 


सहज ही ऊंट ऊंटनी गए 

नदी के परले वाले छोर 

सवारों सहित घोड़ियां अश्व 

तैर कर पार गए उस ओर 


लगे लीलण को मानो पंख 

चली मछली सी मार उछाल 

कहां पानी की इतनी ताब 

रोक दे उस आंधी की चाल 


सामने ही था गांव पनेर 

उधर होने को आई सांझ 

व्यवस्थित भी करने थे वेश 

पगड़ियों को फिर कसकर बांध


 दिखी बड़कों की छतरी वहीं

 आज भी उसको सकते देख 

उसी में पहुंच किया सब ठीक 

वीर तेजा ने अपना वेश।